सिरसागंज: आज के कठिन समय का कबीर वाणी से होगा समाधान-प्रोफेसर राय

सिरसागंज। सामाजिक राजनीतिक धरातल पर जब वर्ण व्यवस्था, जातीयता, ढोंग, पाखंड और अंधविश्वासों का बोझ बढ़ने लगता है। तब कबीर के उद्बोधन याद आते हैं। कबीर की विचारधारा के पारखी गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल राय कहते हैं कि पिछले दस सालों से ऐसा ही कठिन समय चल रहा है, जिसका समाधान कबीर की वाणी में है।

सिरसागंज के राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय और संत कबीर अकादमी लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में कॉलेज में हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो. राय का कहना है कि कबीर की वाणी का 95 प्रतिशत आत्मा और परमात्मा के बीच के संबंध को जानने और मोक्ष पाने का संदर्भ देता है। आध्यात्मिकता के रूप में काव्य की केंद्रीय विषयवस्तु बनता है। उसके अलावा जो 25 प्रतिशत है, वह बहुत छोटा होते हुए भी अत्यंत प्रासंगिक है।

प्रोफेसर राय ने कबीर चिंतन के विविध आयामों पर बेबाकी से अपनी राय रखी। उन्होंने मुख्य सवाल जो बहुत पुराना भी है, कबीर की वाणी का मर्म क्या है। वे भक्त हैं अथवा कवि, उनका आध्यात्मिक विमर्श पहले है या उनका समाजशास्त्रीय विमर्श पर विभिन्न मान्यताओं को रखा। उन्होंने कहा कबीर ने वर्ण व्यवस्था को लेकर जो सवाल उठाए हैं पिछले एक दशक में यह कोशिश की गई है कि उसको कांग्रेस की परियोजना का हिस्सा बता दिया जाए। यह राजनीति कहां तक नहीं हस्तक्षेप कर रही है।

कबीर के पुनरुद्धारक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को भी इसका ही औजार बता दिया गया। राय ने कहा यह वे लोग हैं जो जाति और वर्ण व्यवस्था को लेकर कबीर द्वारा उठाए गए तेजाबी सवालों से आंख नहीं मिला पाए। उनके पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता है। अन्य वक्ताओं में गवर्नमेंट पीजी कॉलेज सिरसागंज के हिंदी विभाग अध्यक्ष डॉक्टर आशुतोष राय, प्रोफेसर राम स्नेही लाल शर्मा यायावर,एफएस विश्व विद्यालय के कुलपति प्रो.संजीव भारद्वाज, कबीर अकादमी के सलाहकार डॉ.आशुतोष द्विवेदी समेत विभिन्न विद्वानों ने कबीर चिंतन के विभिन्न आयाम विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये।

इस अवसर पर कॉलेज की प्राचार्य डॉ. कांति शर्मा ने अतिथियों का स्वागत कर अंगवस्त्र एवं प्रतीक चिन्ह भेंट किये। संगोष्ठी के तृतीय सत्र में ताना बाना समूह के कलाकारों ने कबीर के भजनों और पदो का संगीतमय गायन प्रस्तुत कर समा बाँध दिया।

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